बिलाई माता मंदिर
धमतरी के रुद्री डैम के पास बजार के बीच 250 साल पुराना जागृत देवी मंदिर है। दोनों नवरात्री में यहाँ ज्योत जलाया जाता है।आज जहाँ देवी मंदिर है ,वहाँ घना जंगल था। माना जाता है की 250 साल पहले कांकेर नरेश घोड़े से अपने दल वल के साथ जंगल भ्रमण केलिये निकले थे। रास्ते में जंगल के बीच घोडा विदक गया ,आगे नहीं जा रहा था तो उनलोगो ने वहां एक पत्थर देखे। पत्थर को घेर कर जंगली बिलियाँ थी उन्हें भगाया गया और पत्थर हटाने की बहुत कोशिश किया गया पर पत्थर नहीं हटा पाए। फिर राजा ने वहाँ एक मंदिर वनवा दिया।
माना जाता है की यशोदा जी की पुत्री योग माया कृष्ण जी की बहन माँ विध्यवासीनी यही थी।धरती से प्रगट होने के कारन माता विन्ध्यवासनि और बिलियों के पत्थर के पास होने के कारन बिलाई माता नाम पड़ा।राजा को जहाँ पत्थर मिला था वहीं छोटा सा मंदिर बनवाये थे। धमतरी की चंद्रभागा बाई ने मंदिर में मनौती मानी थी पूर्ण होने के बाद 1917 में मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया।दुबारा मंदिर बनवाने पर मूर्ती को वैसे ही रहने दिया गया जिस कारन दरवाजे के सामने के बदले बगल से मूर्ती दीखता है। देवी का चेहरा बहुत ही मन भावन है।
राजा नरहरदेव ने उत्तर प्रदेश के सरयू नदी के तट से ब्राह्मण पुजारी को आमंत्रित कर पूजा हेतु बुलाया था। तब से अब तक मंदिर में पारी पारी पीढ़ी दर पीढ़ी उसी पुजारी के वंशज पूजा पाठ सम्पन्न करवा रहे है।
रुद्री डैम के पास होने से धमतरी आकर महानदी में बना हुआ डैम का नजारा भी देखना हो जाता है और देवी माँ का दर्शन भी हो जाता है। महानदी का जल ओडीशा तक जाता है।




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