छत्तीसगढ़ ट्राइबल म्यूजियम न्यू रायपुर
शहीद वीर नारायण म्यूजियम
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महाकुम्भ मेला प्रयागराज 2025
हर 6 साल में अर्धकुम्भ और हर 12 साल में पूर्ण कुम्भ प्रयाग में संगम में लगता रहता है। इलाहाबाद जाना आना लगा रहने के कारन कुम्भ और माघ नहाने का अवसर भी मिल ही जाता है। इस बार 6 महीने पहले से ही सोच रखे थे की 2025 का कुम्भ स्नान के लिये संगम जायेंगे। टिकट भी कटा था। पर बाद में पता चला की इस बार का कुम्भ बहुत ही स्पेशल है जो की 144 साल में एक बार होता है।सोचे चलो अच्छा ही है संगम में डुबकी लगा लेंगे। माघ लगा कुम्भ स्नान शुरू हुआ भीड़ भी बहुत होना शुरू हुआ। लोगों को जाम में भी फसना पड़ा पैदल भी चलना हुआ।भीड़ देख कर दो दो बार टिकट भी कैंसल करवाए। पर मन नहीं मान रहा था ,लगा अभी नहीं तो कब, गंगा मैया का नाम लेकर प्रयागराज आखिर पहुँच ही गए।संगम स्नान भी हुआ। दिल बहुत खुश हुआ त्रिवेणी संगम का स्वच्छ निर्मल जल में डुबकी लगाना बड़ा ही अच्छा लगा।वोटिंग का भी मजा लिये। विदेशी पक्छियों के झुंडो को भी देखना अच्छा लगा।देशी तो देशी विदेशी मेहमान लोग भी महाकुम्भ मेले का आनंद उठाए।
कुम्भ स्नान का धार्मिक महत्व तो है ही साथ ही सैकड़ों साधु संतो को भी देखना होता है। बहुत सारा अखाडा लगा रहता है जो की आकर्षण का केंद्र होता है।गंगा में रोज करीब हजारो करोड़ों लोगो ने डुबकी लगाई।उप्र सरकार ने बहुत ही अच्छा व्यवस्था करी थी। साफ सफाई से लेकर हर तरह का इंतजाम। इतने बड़े आयोजन में थोड़ा बहुत भगदड़ तो होता ही है। तीर्थ यात्रियों को थोड़ी असुविधा भी हुई ,फिर भी करीब 66 करोड़ लोग गंगा में डुबकी लगाई और इस महापर्व के महा आयोजन के गवाह बने।पूरा प्रयाग का नजारा भी अद्भुत था। जहाँ तक नजर दौड़ाओ तीर्थ यात्री ही जाते और संगम स्नान कर लौटते दीख रहे थे। प्रयाग निवासी भी तीर्थयात्रियों का बहुत साथ दिया। महीनो तक जगह जगह लंगर चलता रहा। अपने अपने सामर्थ से सभी सेवा किये।
चाय बगान में परिवार संग मस्ती
कुन्नूर के चाय बगान में परिवार के साथ खूब घूमें। हम सबोने खूब मस्ती किया। अपने हाँथ से सबोने चाय की पत्तियाँ तोड़ कर घर लाये। चाय की पत्तियों से पकौड़ा बना कर खाये। जैसे पालक का पत्ता का बेसन लपेट कर पकौड़ा बनता है ,ठीक वैसे ही चाय की नरम पत्तियों से कुन्नूर में पकौड़ा बनाया जाता है। सबों को बहुत अच्छा लगा। नए लोग को नहीं बताने पर वे तो पालक का ही पकौड़ा समझेंगे। ठण्ड के मौसम में गरमा गरम चाय के साथ पकौड़ा खाने का मजा ही कुछ और है।
नीलगिरि समर फेस्टिवल शो
हर साल पुरे नीलगिरी डिस्ट्रीक्ट में मई के महीने में जितने भी गार्डन है ,वहाँ पर शनिवार और रविवार को हर हफ्ता अलग अलग थीम में शो होता है।कोटागिरी के गार्डन में वेजीटेबल शो में वेजीटेबल से तरह तरह का आकृति बना होता है। गुडलूर के गार्डन में मसाला से आकृति बना होता है। ऊटी के रोज गार्डन में रोज शो में सैकड़ों वेराइटी का गुलाब देखने मिलता है। ऊटी के बॉटनीकल गार्डन में अनेक वेराइटी का फूल और फूल से बना आकृति देखने मिलता है। अंत में मई के लास्ट रविवार को कुन्नूर के सिम्स पार्क में फ्रूट शो होता है। यहाँ भी फलों से तरह तरह का जीव ,जन्तु का आकृति बना हुआ देखते ही बनता है। शो समाप्त होने के बाद सारे फल ,सब्जी से जैम, जेली अंचार आदि बनाने के उपयोग में लिया जाता है। हमारे घर के पास ही सिम्स पार्क होने के कारन हर साल समर फेस्टीवल का आनंद उठा पाते है। ऊटी हिल स्टेशन होने के कारन पुरे मई जून के महीने में लाखो टूरिस्ट घूमने आते है और समर फेस्टीवल का आनंद उठाते है।
साईं बाबा मंदिर एडापल्ली कुन्नूर
कुन्नूर के पास एडापल्ली गावं में, सिद्धगिरी पर्वत में, जंगल के बीच शांत एकांत वातावरण में ,शिरडी के साईं बाबा का मंदिर है। मेन मंदिर में साईं बाबा का 7 फ़ीट ऊँचा मार्बल का मूर्ती है। मूर्ती के सामने स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है। मंदिर बने करीब 15 साल हो गया है। मंदिर के प्रांगण में एक कृष्ण जी का धातु का बड़ा सा मूर्ती है। प्रांगण के चारो तरफ सारे देवी देवता विराज मान है। पंचमुखी हनुमान जी ,विष्णु जी ,लक्ष्मी जी ,श्री यंत्र ,रामदरवार आदि है। गुरुवार को विशेष पूजा ,अर्चना ,आरती आदि मंदिर में होता है और प्रसाद वितरण होता है।कुन्नूर से 10 मिनट ही लगता है आने में पर आने के बाद बहुत ही अच्छा लगता है।
श्री थांथी मरियम्मन मंदिर
अंग्रेजों के ज़माने में कुन्नूर जंगल के बीच में एक छोटा सा गावँ था। अंग्रेजो ने टेलीग्राम के लिये इस जगह खम्भा लगवाया था जो आज भी मंदिर के प्रांगण में है।एक भक्त को स्वप्न में देवी प्रगट हुई थी ,वहाँ खोदाई करने पर देवी माँ का मूर्ती मिला जिसे स्थापित कर के मंदिर बनवाया गया। इसलिए देवी को स्वम्भू माना जाता है। मंदिर प्राचीन और छोटा जरूर है पर देवी जागृत लगती है। हमेशा पूजा होने के कारन भक्तों का ताँता लगा रहता है। हर मंगलवार ,शुक्रवार ,नवरात्री ,दिवाली ,तमिल नया साल आदि विशेष पर्व त्यौहार में विशेष पूजा ,अर्चना होता है। जिस साल बारिश नहीं होता है तो भक्त पूजा अर्चना करते थे तो बारिश होता था इसलिए देवी को बारिश की देवी भी बोला जाता है। भक्त अपनी मनोकामना पूर्ण होने के लिये पूजा करने आते है और फल पाते है।